Wednesday, November 17, 2010

ग़ज़ल : ठोकरें खा के, गिर के, संभलता रहा


तम से लड़ता रहा दीप जलता रहा
हर निशाचर की आँखों में खलता रहा


तन बँधा ही सही मन तो आज़ाद था
रात दिन तेरी जानिब ही चलता रहा


जो न होना था होता रहा हर घड़ी
हां जो होना था होने से टलता रहा


हम जहां थे वहीं के वहीं रह गए
वक़्त आगे ही आगे निकलता रहा


सांप बन के डसा है उसी ने हमें
आस्तीं में हमारी जो पलता रहा


मुझको जीना था, हर हाल में जी गया
ठोकरें खा के, गिर के, संभलता रहा


गीली मिट्टी के जैसी थी हस्ती मेरी
उसने जिस रूप ढाला मैं ढलता रहा


ओढ़ कर अपने चेहरे पे चेहरे कई
इक अंधेरा उजाले को छलता रहा



--
रवि कांत 'अनमोल'
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Sunday, October 3, 2010

ग़ज़ल : हमारी जात हिन्दी, धर्म है ईमान है हिन्दी

हमारी आन है हिन्दी हमारी शान है हिन्दी
हमारे प्यारे हिन्दोस्तान की पहचान है हिन्दी

हमारी माँ है हिन्दोस्तान की धरती जहाँ वालो
हमारी जात हिन्दी, धर्म है ईमान है हिन्दी

समूचा ज्ञान हमने हिन्दी के कदमों में पाया है
हमारा वेद है हिन्दी हमे कुरआन है हिन्दी

हमें हिन्दोसितां को फिर वही दर्जा दिलाना है
कि हिन्दोस्तान के उत्थान का ऐलान है हिन्दी

सभी भारत की भाषाओं की है हिन्दी बड़ी दीदी
महब्बत से सभी बहनों का रखती ध्यान है हिन्दी


--
रवि कांत 'अनमोल'

कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Friday, October 1, 2010

शशि भूषण चिराग़ की 7 ग़ज़लें

शशि भूषण चिराग कल शाम ३ बजे ग़ुज़र गए। यह समाचार मुझे आज सुबह ही मिला।
चिराग़ साहिब के न रहने की ख़बर मेरे लिए एक झकझोर डालने वाली ख़बर है। ख़ास
तौर पर तब जब मैं घर से २५०० किलोमीटर दूर अकेला हूँ। मेरे इस दुख को
समझने या बांटने वाला मेरे आस पास कोई नहीं है। चिराग़ मेरे लिए केवल
दोस्त या अच्छा शाइर नहीं बल्कि मेरा दूसरा रूप ही था।
उनकी कितनी ही ऐसी ग़ज़लें हैं जिनके कहे जाने की प्रक्रिया में मैं
प्रत्यक्ष रूप में शामिल रहा हूँ। इन ग़ज़लों का जन्म होते मैंने देखा है।
7 उनका प्रिय अंक था। अपने हर काम , हर चीज़ के साथ वो इसे जोड़ कर ख़ुश
होते थे। उनकी 7 ग़ज़लें मेरे ब्लाग पर रहेंगी तो लगेगा कि वो अब भी मेरे
पास मौजूद हैं।


1
मेरी धड़कनों में रवानी रहेगी
अगर आपकी मेहरबानी रहेगी

चलो नाम अपना शजर पर कुरेदें
महब्बत की कोई निशानी रहेगी

रहेंगे हमेशा यहाँ चाँद सूरज
ये दुनिया मगर आनी जानी रहेगी

यकीं है मुझे तू भी पिघलेगा इक दिन
कहां तक तेरी बदगुमानी रहेगी

तेरे लब पे मेरा फ़साना रहेगा
मेरे लब पे तेरी कहानी रहेगी

तुम्हारा तुम्हारा तुम्हारा रहूँगा
जहां तक मेरी ज़िन्दग़ानी रहेगी

'चिराग़' इस कहानी में फ़िर क्या रहेगा
न राजा रहेगा न रानी रहेगी


शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'

2
किसी की आँख का सपना हुआ हूँ
चमन में फूल सा महका हुआ हूँ

मिरी हस्ती मिटा डालें न पत्थर
मैं शीशे की तरह सहमा हुआ हूँ

नज़र आता हूँ बाहर से मुकम्मल
मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ

मैं कांटा और मेरा ये मुकद्दर
ग़ुलों की शाख़ से लिपटा हुआ हूँ

नहीं कोई जो थामे हाथ मेरा
भरी दुनिया में यूँ तन्हा हुआ हूँ

कभी तुम मेरी जानिब उड़ के आना
मैं अंबर की तरह फैला हुआ हूँ

'चिराग़' ऐसे मक़ाम आए हैं अक्सर
कभी सागर कभी सहरा हुआ हूँ


शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'

3
दे सभी मुश्क़िलों का हल मुझको
पूछना है किसी ने कल मुझको

पाँव ये कह रहे हैं और नहीं
हौसिले कह रहे हैं चल मुझको

जिनपे छिलका न जिनमें गुठली हो
अच्छे लगते हैं ऐसे फ्ल मुझको

आप अपने से बात करता हूँ
क्या हुआ है ये आज कल मुझको

जो गुज़ारा है तुम ने साथ मेरे
याद है एक एक पल मुझको

क्या खबर थी जो आज बिछुड़ा है
लौट कर फिर मिलेगा कल मुझको

ख़ाक ये कह रही है उड़ उड़ के
अपने मुंह पर 'चिराग़' मल मुझको


शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'

4
मेरी क़िस्मत में जो लिखा होगा
मुझको वो ही तो कुछ मिला होगा

मैं उसे चाहता तो हूँ लेकिन
इक मेरे चाहने से क्या होगा

वक़्त रुक जाएगा वहीं आ कर
जब मेरा उनका सामना होगा

ये कहे डूबता हुआ सूरज
एक दिन सब को डूबना होगा

आज हसरत से देख लूँ तुमको
जाने फिर कब ये देखना होगा

सब तुझे ढूढते हैं रह रह कर
तेरा कुछ तो अता पता होगा

तू करे है 'चिराग़' क्यूँ शिकवा
जो मिला आज कल जुदा होगा

शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'


5
तुमने दिए जो दर्द वो पाले नहीं गये
हमसे तुम्हारे ज़ख़्म सभाले नहीं गये

दिन रात मैंने टूट के कोशिश हज़ार की
लिक्खे हुए तक़दीर के पाले नहीं गये

जिनको ख़ुदा का दिल ही में दीदार हो गया
मस्जिद नहीं गए वो शिवाले नहीं गये

माना तुम्हारी चाह के काबिल नहीं थे हम
फिर क्यों तुम्हारे दिल से निकाले नहीं गये

अब रास्ते में उनकी हिफ़ाज़त करे ख़ुदा
जो साथ अपने, मां की दुआ ले नहीं गये

इक बार ही मिली थी नज़र से तेरी नज़र
आँखों से उसके बाद उजाले नहीं गये

वि सरफिरी हवा भी उड़ा ले नहीं गई
दरिया भी मुझको साथ बहा ले नहीं गये

मेरी इबादतों में रही कुछ न कुछ कमी
पत्थर के बुत ख़ुदाओं में ढाले नहीं गये

जो जिस्म पर थे सूख गये कब के ऐ 'चिराग़'
लेकिन जो रूह पर थे वो शाले नहीं गये

शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'


6
मुझे वो मोतियों में तोल देता
अगर मैं उसके हक़ में बोल देता

दिल-ओ-जां नाम कर देता मैं उसके
मुझे जो इन का वाजिब मोल देता

खुले आकाश में उड़ सकता मैं भी
ख़ुदा जो तू मिरे पर खोल देता

किसे मजबूरियाँ होती नहीं हैं
अगर कुछ बात थी तो बोल देता

सुना कर प्यार के दो गीत मीठे
मेरे कानों में भी रस घोल देता

अगर मोहताज ही रखना था मुझको
मेरे हाथों में भी कश्कोल देता

'चिराग़' उस को यक़ीं होता जो मुझ पर
वो सारे राज़ मुझ पर खोल देता

शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'

7
सबकी सुनता है और अपनी कहता है
दीवाना है अपनी मौज में रहता है

बहते दरिया मिल जाते हैं सागर में
सागर तो अपने ही अंदर बहता है

तुझ को कोई होश नहीं परवाह नहीं
किस की याद में खोया-खोया रहता है

रहती है उन आँखों में खामोशी सी
क्या जाने उस दिल में क्या क्या रहता है

कौन 'चिराग़' किसी का महरम दुनिया में
कौन किसी से दिल की बातें कहता है


शाइर - शशि भूषण 'चिराग़'

--
रवि कांत 'अनमोल'

Saturday, September 25, 2010

ग़ज़ल :किसी की सोच है बेटे को सिंहासन दिलाना है

उसे मस्जिद बनानी है इसे मंदिर बनाना है
मुझे बस एक चिंता,कैसे अपना घर चलाना है
सियासी लोग सब चालाकियों में हैं बहुत माहिर
इन्हें मालूम है कब शाहर में दंगा कराना है

किसी का ख़ाब है मां-बाप को कुछ काम मिल जाए
किसी की सोच है बेटे को सिंहासन दिलाना है

भले अल्लाह वालों का हो झगड़ा राम वालों से
मगर पंडित का मौलाना का यारो इक घराना है

लड़ाई धर्म पर हो, जात पर हो या कि भाषा पर
लड़ाई हो! सियासत का तो बस अब ये निशाना है


--
रवि कांत 'अनमोल'

कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

ग़ज़ल:चलें हम साथ मिल कर हाल अपना एक जैसा है

लुटे तुम मौलवी से तो हमें पंडित ने लूटा है
चलें हम साथ मिल कर हाल अपना एक जैसा है
मुहम्मद कृष्ण या जीसस कहां लड़वाते हैं हम को
सभी चरवाहे हैं, पूछो तो किस का किस से झगड़ा है
अज़ल ही से रहे हैं आदमी के सिर्फ़ दो मजहब
जिसे लूटा गया है और इक वो जिस ने लूटा है
ये जन्नत किस तरफ़ है मौलवी से पूछ कर देखो
ये बातें स्वर्ग की बस पादरी, पंडित का धोका है

--
रवि कांत 'अनमोल'
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

ग़ज़ल : ‘अनमोल’ अपने आप से कब तक लड़ा करें

'अनमोल' अपने आप से कब तक लड़ा करें
जो हो सके तो अपने भी हक़ में दुआ करें

हम से ख़ता हुई है कि इंसान हैं हम भी
नाराज़ अपने आप से कब तक रहा करें

अपने हज़ार चेहरे हैं, सारे हैं दिलनशीं
किसके वफ़ा निभाएं हम किससे जफ़ा करें

नंबर मिलाया फ़ोन पर दीदार कर लिया
मिलना सहल हुआ है तो अक्सर मिला करें

तेरे सिवा तो अपना कोई हमज़ुबां नहीं
तेरे सिवा करें भी तो किस से ग़िला करें

दी है कसम उदास न रहने की तो बता
जब तू न हो तो कैसे हम ये मोजिज़ा करें


--
रवि कांत 'अनमोल'

कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Friday, September 24, 2010

ग़ज़ल : और वो लड़की अकेली रह गई

बिन कहे कोई कहानी कह गई
उसकी आँखों में नमी सी रह गई

बर्फ़ ख़ाबों की जो पिघली ज़िहन में
आँख से कोई नदी सी बह गई

मैं भी तन्हा हो गया हो कर जुदा
और वो लड़की अकेली रह गई

आसमानों ने सितम ढाये बहुत
वो तो धरती थी कि सब कुछ सह गई

फूल डाली पर लगा है झूमने
कान में उसके हवा क्या कह गई

--
रवि कांत 'अनमोल'
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Thursday, September 23, 2010

ग़ज़ल : भला परदेस जा कर क्या करोगे

मेरी दुनिया में आकर क्या करोगे
नए सपने सजा कर क्या करोगे
वफ़ा जब खो चुकी अपने म'आनी
वफ़ा का गीत गाकर क्या करोगे
समेटो ख़ाब जो टूटे हुए हैं
नई दुनिया बसा कर क्या करोगे
तुम्हारे अपने ग़म काफ़ी हैं ऐ दिल
किसी का ग़म उठा कर क्या करोगे
ख़ुद अपने बाजुओं को आज़माओ
किसी को आज़मा कर क्या करोगे
है जब तक़दीर में रोना ही रोना
घड़ी भर मुस्करा कर क्या करोगे
मैं इक खंडहरनुमा सुनसान घर हूँ
मिरे दिल में समा कर क्या करोगे
वो रस्में जिन से तुम उकता चुके हो
वही रस्में निभा कर क्या करोगे
जब अपने घर में ही कुछ कर न पाए
भला परदेस जा कर क्या करोगे
चले आए हो जिस महफ़िल से उठकर
उसी महफ़िल में जाकर क्या करोगे
मसीहा बन के आ़ख़िर क्या मिलेगा
मसीहाई दिखा कर क्या करोगे
यहाँ हर आदमी वादा शिकन है
तुम्हीं वादे निभा कर क्या करोगे

रवि कांत 'अनमोल'
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Sunday, September 19, 2010

ग़ज़ल :अब तक धरती गोल रही है

बाग़ में कोयल बोल रही है
भेद किसी का खोल रही है

मेरे देस की मिट्टी है जो
रंग फ़ज़ा में घोल रही है

जीवन की नन्ही सी चिड़िया
उड़ने को पर तोल्र रही है

कोई मीठी बात अभी तक
कानों में रस घोल रही है

मोल नहीं कुछ उस दौलत का
जो कल तक अनमोल रही है

बाहर उसकी गूँज ज़ियादा
जिसके अंदर पोल रही है

देखें क्या होता है आगे
अब तक धरती गोल रही है

तू भी उसके पीछे हो ले
जिसकी तूती बोल रही है

Wednesday, September 1, 2010

ग़ज़ल : हमारा मिस्री माखन खो गया है ( श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर )

कहां गाँवों का गोधन खो गया है
हमारा मिस्री माखन खो गया है

दिए जो ख़ाब हमने ऊँचे-ऊँचे
उन्हीं में नन्हा बचपन खो गया है

महब्बत में समझदारी मिला दी
हमारा बावरापन खो गया है

जहा की दौलतें तो मिल गई हैं
कहीं अख़लाक का धन खो गया है

सुरीली बांसुरी की धुन सुनाकर
कहां वो मद-न-मोह-न खो गया है

रवि कांत 'अनमोल'
मेरी रचनाएं
http://aazaadnazm.blogspot.com
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

Sunday, August 29, 2010

ग़ज़ल : प्यासे हैं हम नदी किनारे क्या कीजे

उनसे मिलते हैं ग़म सारे क्या कीजे
फिर भी वो लगते हैं प्यारे क्या कीजे

सर ढकने को छत मिलती तो अच्छा था
किस्मत में हैं चंद सितारे क्या कीजे

टूटे सपने अंधी आँखों में लेकर
मर जाते हैं लोग बेचारे क्या कीजे

जिन लोगों ने दुनिया की ख़ातिर सोचा
वो फिरते हैं मारे मारे क्या कीजे

या तो वो बहरे हैं जिनको सुनना था
या गूँगे हैं गीत हमारे क्या कीजे

शायर की आँखों में आग न पानी है
प्यासे हैं हम नदी किनारे क्या कीजे


--
रवि कांत 'अनमोल'
कविता कोश पर मेरी रचनाएं
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

ग़ज़ल :मेरे अंदर कहीं कुछ टूटता है

मेरा दम मेरे अंदर घुट रहा है
कहाँ है जो दरीचे खोलता है

हमेशा आइनों से झाँकता है
न जाने क्या वो मुझसे चाहता है

वो अपनी हर नज़र से हर अदा से
हज़ारों राज़ मुझपे खोलता है

मैं जितना इस जहाँ को देखता हूँ
मेरे अंदर कहीं कुछ टूटता है

जवाब उनके नहीं मिलते कहीं से
सवाल ऐसे मेरा दिल पूछता है

मैं शायद ख़ुद को खो के तुम को पा लूँ
मगर इतना कहाँ अब हौसला है

मैं पल पल सुन रहा हूँ बात उसकी
मेरे कानों में कोई बोलता है


--
रवि कांत 'अनमोल'
मेरी कविता
http://aazaadnazm.blogspot.com
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2

ग़ज़ल : क्या जगह है? मुझको ले आए कहां?

दो घड़ी इस दिल को बहलाए कहां
आदमी जाए तो अब जाए कहां

सरह्दें ही सरहदें हैं हर तरफ़
क्या जगह है? मुझको ले आए कहां?

झड़ गए पत्ते तो शाख़ें कट गई
अब दरख़्तों में हैं वो साए कहां

आम का वो पेड़ कब का कट चुका
कोयल अब गाए भी तो गाए कहां

खेल कर होली हमारे ख़ून से
पल में खो जाते हैं वो साए कहां

जिनमें कुछ इनसानियत हो, प्यार हो
अब मिलेंगे ऐसे हमसाए कहां
(हमसाए=पड़ोसी)

जिनको गाने के लिए आए थे हम
हमने अब तक गीत वो गाए कहां

--
रवि कांत 'अनमोल'
मेरी नज़्में http://aazaadnazm.blogspot.com

Tuesday, August 3, 2010

ग़ज़ल

मैत्री दिवस पर

दोस्ती को मात मत कर दोस्ती के नाम पर
इस तरह की बात मत कर दोस्ती के नाम पर

गर भरोसा उठ गया है हाथ मेरा छोड़ दे
तल्ख़ यूं जज़्बात मत कर दोस्ती के नाम पर

मुझपे पहले ही ज़माने भर के हैं एहसां बहुत
और एहसानात मत कर दोस्ती के नाम पर

मुझसे कोई बात कर अच्छी बुरी, खोटी ख़री
हाँ मगर कुछ बात मत कर दोस्ती के नाम पर

मैं बड़ी मुश्क़िल से जीता हूँ दिलों के खेल में
अब ये बाज़ी मात मत कर दोस्ती के नाम पर

मुझको मेरे हाल पर रहने दे ऐ मेरे हबीब
रहम की ख़ैरात मत कर दोस्ती के नाम पर

दोस्ती बदनाम हो जाए न दुनिया में कहीं
ऐसी वैसी बात मत कर दोस्ती के नाम पर

मुझसे रिश्ता तोड़ता है तोड ले तू हाँ मगर
आग की बरसात मत कर दोस्ती के नाम पर

दोस्ती एहसास है एहसास रहने दे इसे
बहस यूं दिन रात मत कर दोस्ती के नाम पर

--
रवि कांत 'अनमोल'
aazaadnazm.blogspot.com
मेरी नज़्में

ग़ज़ल

मैत्री दिवस पर

प्यार की दोस्ती की बात करें
आइए ज़िन्दगी की बात करें

कोई हासिल नहीं है जब इसका
किस लिए दुश्मनी की बात करें

ज़िक्र हो तेरी अक़्लो-दानिश का
मेरी दीवानगी की बात करें

आप नज़दीक जब नहीं तो फिर
किस से हम अपने जी की बात करें

बीती बातों में कुछ नहीं रक्खा
बैठिए हम अभी की बात करें

बात कुछ आपकी हो मेरी हो
और हम क्यूं किसी की बात करें


--
रवि कांत 'अनमोल'
aazaadnazm.blogspot.com
मेरी नज़्में

Friday, March 26, 2010

गज़ल

डाल से टूट कर जो बिखर जाएँगे
फिर ये पत्ते जाने किधर जाएँगे

कौन अपना है अब, किसके घर जाएँगे
हम मुसाफ़िर जाने किघर जाएँगे


हम तो पत्थर हैं क्या अपनी औकात है
तू सँवारेगा तो हम सँवर जाएँगे

है मुकद्दर में भटकन, भटकते हैं हम
होगा तक़दीर में तो ठहर जाएँगे

एक तेरे सिवा और मँज़िल नहीं
लौटना ही पड़ेगा जिधर जाएँगे

मेरी राहें बहुत हैं कठिन देखिए
कौन से मोड़ तक हमसफ़र जाएँगे

वो नकाब अपना उलटेंगे कुछ देर में
वो नज़ारा भी हम देखकर जाएँगे







रवि कांत 'अनमोल'

Friday, January 22, 2010

शहीद की माँ से

राह तकती हो रात दिन जिसकी,
वो कभी लौट कर न आएगा
वो तिरा लाडला कभी फिर से,
तेरे पैरों को छू न पाएगा
कर सकेगा न रसभरी बातें,
ला सकेगा न अब वो सौग़ातें
लोग कहते हैं देश की ख़ातिर
जान कुर्बान कर गया है वो
उसने राहे वतन पे हँस हँस के
जान दे दी है मर गया है वो

एसी बातों पे मत यकीं करना
लोग झूटे हैं बात झूटी है
लाल तेरा मरा नहीं अम्मा
वो तिरा लाल मर नहीं सकता
देश के रास्ते पे चलते हुए
देश में लीन हो गया है वो
बन के ख़ुश्बू वतन की मिट्टी की
इन हवाओं में खो गया है वो
देश का इक जवान था पहले
आज कुल देश हो गया है वो

आज से कुल वतन तिरा बेटा
आज से तू वतन की अम्मा है
देश का हर जवान हर बच्चा
तेरा वेटा है तेरा अपना है

रवि कांत 'अनमोल'

नागालैंड की वादियों में

नागालैंड की वादियों में
(अगस्त २००६ में मोकोकचुंग-नागालैंड में लिखी गई कविता)
ये बादल इस तरह उड़ते हैं जैसे
कोई आवारा पंछी उड़ रहा हो।
पहाड़ों की ढलानों से सटे से
हरे पेड़ों की डालों से निकल के
उन उँची चोटियों पर बैठते हैं।
और उसके बाद गोताखोर जैसे
उतर जाते हैं इन गहराइयों में
पहुँच जाते हैं गहरी खाइयों में।
सड़क जो इस पहाड़ी से है लिपटी
कभी हैरत से उसको देखते हैं
कभी सहला के उसको पोंछते हैं
कभी पल भर में कर देते हैं गीला
भिगो देते हैं चलती गाड़ियों को।
ये बादल इस तरह से खेलते हैं
कि जैसे हो कोई बच्चों की टोली
कभी हँसते हैं रो लेते हैं ख़ुद ही
कहाँ परवाह दुनिया की है इनको
जहाँ के रंजो-ग़म से दूर हैं ये,
फ़क़ीरों की तरह हैं मस्तमौला
न जाने किस नशे में चूर हैं ये।

रवि कांत 'अनमोल'

सम्मान



मेरा सम्मान मत करना
क्योंकि मैं एक इंसान हूँ
और इंसान में होती हैं
सौ बुराइयाँ भी
सौ कमज़ोरियाँ भी।
इंसान में होते हैं
सौ अवगुण भी
सौ दोष भी।
इसलिए
मुझे सम्मानित हर्ग़िज़ मत करना
क्योंकि जो हार तुम मुझे पहनाओगे
वही पहन लेंगी मेरी कमज़ोरियाँ भी
जिस आसन पर तुम मुझे बैठाओगे
मेरे साथ उसी पर बैठेंगे
मेरे दोष भी।
और मेरे दोस्त!
आसन पर बैठे हुए दोषों से बुरा
कुछ नहीं होता।
आसन पर बैठे दोष
दोषी बना देते हैं एक युग को।
सिंहासन पर बैठी कमज़ोरियाँ
कमज़ोर बना देती हैं एक पीढ़ी को।
इस लिए मत सम्मान देना मुझे
मेरे दोषों और कमज़ोरियों के साथ।
अगर कोई एकाध अच्छाई
मिल जाए मुझमें
तो सम्मान देना उसे।
मेरा नाम लिए बग़ैर
उसे पहनाना श्रद्धा के हार
और बैठा लेना
ह्रदय के सिंहासन पर
उसे।
मुझे नहीं।
क्योंकि मैं एक इंसान हूँ
और इंसान में होती हैं
सौ कमज़ोरियाँ भी,
सौ बुराइयाँ भी।
रवि कांत 'अनमोल'

पूर्वोत्तर भारत

पूर्वोत्तर भारत (फ़रवरी २००६ में शिलांग में लिखी गई कविता)

ये वादियों में दूर तक फैली हुई झीलें
गाहे-बगाहे इनमें नज़र आती किश्तियाँ
जंगल के बीच बीच में लहराती ये सड़कें
गाहे-बगाहे उनपे आती जाती गाड़ियाँ
सरसब्ज़ पहाड़ों की सियह रंग यह मिट्टी
मिट्टी से खेलते हुए मासूम से बच्चे
ये चाय के बागों में गा के झूमती परियाँ
जंगल में काम करते कबीले के लोगबाग
मिट्टी से सराबोर मिट्टी के दुलारे
बाँसों के झुरमुटों में मचलती ये हवाएँ
हैरत में डालती हुई ये शोख़ घटाएँ
दिल खींच रहे हैं तेरे रंगीन नज़ारे
आकाश से उतरा है जो ये हुस्न ज़मीं पर
जी चाहता है आज कि ऐ बादलों के घर १
ये हुस्न तेरी वादियों का साथ ले चलूँ।

१. मेघालय
 
रवि कांत 'अनमोल'

कविता

तुम एक कविता ही तो हो
एक सजीव कविता
तुम ही तो कारण हो
मेरे हाथों लिखे जाते इन अक्षरों का
तुम ही तो मेरी आँखों के रास्ते मेरी आत्मा में उतरती हो
और फिर अक्षर बन कर, संगीत बन कर,
आनन्द  बन कर और सच्चाई बन कर
फूटती हो मेरी कलम से, मेरे मन से, मेरी जिह्वा से।
तुम्हारा हँसना, रूठना, उठना, बैठना, चलना
तुम्हारा देखना और न देखना
सभी कुछ कविता है संगीत है।
तुम्हारा दीद कविता है, तुम्हारी तलाश कविता है,
तुम्हारा मिलना कविता है, तुम्हारी जुदाई कविता है।
तुम रस की फुहार हो और मैं जन्मों क प्यासा।
तुम्हारा होना भी,तुम्हारा न होना भी
दोनो मेरे दिल को छूते हैं,झकझोरते हैं।
और फिर शब्द पैदा होते हैं
जो तुम्हारे रूप का प्रतिबिंब होते हैं।
लोग इन्हें कविता कहते हैं
लेकिन वास्तविक कविता तो तुम ही हो
और मैं तुम्हारा श्रोता।

 रवि कांत 'अनमोल'

पत्थर

पत्थर-पत्थर नहीं होते।
ये तो ऐसे बदनसीब होते हैं,
जिन्हें ईश्वर ने, ठोकरें खाने के लिए बनाया है।
कभी हवा, कभी पानी और कभी अपने ही साथियों की
ठोकरें खाते, बेचारे सारी उम्र भटकते रहते हैं
और अंत में उम्र बिता कर रेत हो जाते हैं।
पत्थर-पत्थर नहीं होते।
ये तो सज़ा काटने आई आत्माएं होते हैं
जिनके लिए ईश्वर ने हर तकलीफ़ का इंतज़ाम किया है
धूप,आँधी,,बारिश,बाढ़, ठोकरें और लानतें
सब कुछ इनके लिए ही होता है।
सभी कुछ झेलते-झेलते बेचारे पत्थर?
अपना पत्थरपन भी अंत में गँवा बैठते हैं।
पत्थर-पत्थर नहीं होते।
ये तो टूटी फूटी चट्टाने होते हैं।
जो कभी हवा कभी पानी के बहाव में आकर
आपस में टकरा-टकरा कर चूर-चूर होते रहते हैं।
कोई बाहरी ताक़त इन्हें कम ही तोड़ती है।
ये आपस में ही एक दूसरे को तोड़-फोड़ कर
रेत कर लेते हैं।
पत्थर-पत्थर नहीं होते।
ये तो मेरे देश के शोषित-शासित लोग होते हैं।
जिन्हें यह भी नहीं पता कि जब पत्थर मिल कर रहते हैं
तो चट्टान कहलाते हैं,
और कोई आँधी,कोई तूफ़ान, कोई बारिश या बाढ़
चट्टान का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
पत्थर जब एक दूसरे की हिफ़ाज़त में खड़े होते हैं
तो वक़्त की चाल धीमी पड़ जाती है।
पत्थर-बेचारे अनजान पत्थर
सिर्फ़ इतना ही जानते हैं
कि पानी या हवा के बहकावे में आकर
आपस में टकराना है।
मूर्तियां बन कर बैठे अपने ही साथियों से
धोखा खाना है।
अंततः आपस में टकरा-टकरा कर रेत हो जाना है।
पत्थर-शायद पत्थर ही होते हैं।
पगले पत्थर।

रवि कांत 'अनमोल'

मूल पंजाबी कविता

ਪੱਥਰ
ਪੱਥਰ, ਪੱਥਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ
ਇਹ ਤਾਂ ਓਹ ਬਦਨਸੀਬ ਹੁੰਦੇ ਹਨ
ਜਿਹਨਾਂ ਨੂੰ ਰੱਬ ਨੇ ਠੋਕਰਾਂ ਖਾਣ ਲਈ ਬਨਾਇਆ ਹੈ|
ਕਦੇ ਹਵਾ ਕਦੇ ਪਾਣੀ ਤੇ ਕਦੇ ਆਪਣੇ ਹੀ ਸਾਥੀਆਂ ਦੀਆਂ
ਠੋਕਰਾਂ ਖਾਂਦੇ, ਵਿਚਾਰੇ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਭਟਕਦੇ ਫ਼ਿਰਦੇ ਨੇ
ਤੇ ਆਖ਼ਰ ਉਮਰ ਭੋਗ ਕੇ ਰੇਤ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ

ਪੱਥਰ, ਪੱਥਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ
ਇਹ ਤਾਂ ਸਜ਼ਾ ਭੋਗਣ ਆਈਆਂ ਰੂਹਾਂ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਰੱਬ ਨੇ ਹਰ ਤਸੀਹੇ ਦਾ ਇੱਤਜ਼ਾਮ ਕੀਤਾ ਹੈ|
ਧੁੱਪ, ਹਨੇਰੀ, ਬਾਰਸ਼, ਹੜ੍ਹ ਠੋਕਰਾਂ ਤੇ ਲਾਹਨਤਾਂ
ਸਾਰਾ ਕੁਝ ਇਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਹੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ|
ਸਭ ਕੁਝ ਝੱਲਦੇ-ਝੱਲਦੇ ਵਿਚਾਰੇ ਪੱਥਰ
ਆਪਣਾ ਪੱਥਰਪੁਣਾ ਵੀ ਆਖਰ ਨੂੰ ਗਵਾ ਬਹਿੰਦੇ ਨੇ|

ਪੱਥਰ, ਪੱਥਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ
ਇਹ ਤਾਂ ਟੁੱਟੀਆਂ ਭੱਜੀਆਂ ਚੱਟਾਨਾਂ ਹੁੰਦੇ ਨੇ|
ਜਿਹੜੇ ਕਦੇ ਹਵਾ ਤੇ ਕਦੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਰੋੜ੍ਹ 'ਚ ਆ ਕੇ
ਆਪਸ 'ਚ ਟਕਰਾ ਟਕਰਾ ਕੇ ਚੂਰੋ-ਚੂਰ ਹੋਈ ਜਾਂਦੇ ਨੇ|
ਕੋਈ ਬਾਹਰੀ ਤਾਕਤ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਘੱਟ ਹੀ ਤੋੜਦੀ ਹੈ|
ਇਹ ਆਪਸ 'ਚ ਹੀ ਇੱਕ ਦੂਸਰੇ ਨੂੰ ਭੰਨ ਤੋੜ ਕੇ
ਰੇਤ ਕਰੀ ਜਾਂਦੇ ਨੇ|

ਪੱਥਰ, ਪੱਥਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ
ਇਹ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਸ਼ੋਸ਼ਤ ਸ਼ਾਸਿਤ ਲੋਕ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਵੀ ਨਹੀਂ ਪਤਾ ਕਿ ਜਦ ਪੱਥਰ ਜੁੜ ਕੇ ਬਹਿੰਦੇ ਨੇ
ਤਾਂ ਚੱਟਾਨ ਅਖਵਾਉਂਦੇ ਨੇ|
ਤੇ ਕੋਈ ਨ੍ਹੇਰੀ, ਕੋਈ ਝੱਖੜ, ਕੋਈ ਬਾਰਸ਼ ਜਾਂ ਹੜ੍ਹ
ਚੱਟਾਨ ਦਾ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਵਿਗਾੜ ਸਕਦਾ|
ਪੱਥਰ ਜਦ ਇੱਕ ਦੂਸਰੇ ਦੀ ਹਿਫ਼ਾਜ਼ਰ 'ਚ ਖੜੇ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਤਾਂ ਵਕਤ ਦੀ ਚਾਲ ਮੱਠੀ ਪੈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ|

ਪੱਥਰ- ਵਿਚਾਰੇ ਅਣਜਾਣ ਪੱਥਰ
ਸਿਰਫ਼ ਇਹੋ ਜਾਣਦੇ ਨੇ
ਕਿ ਪਾਣੀ ਜਾਂ ਹਵਾ ਦੇ ਬਹਿਕਾਵੇ 'ਚ ਆ ਕੇ
ਆਪਸ 'ਚ ਟਕਰਾਉਣਾ ਹੈ
ਮੂਰਤੀਆਂ ਬਣ ਆਸਨ ਤੇ ਬੈਠੇ
ਆਪਣੇ ਹੀ ਸਾਥੀਆਂ ਤੋਂ ਧੋਖਾ ਖਾਣਾ ਹੈ
ਤੇ ਆਖਰ ਆਪਸ 'ਚ ਹੀ ਟਕਰਾ ਕੇ ਰੇਤ ਹੋ ਜਾਣਾ ਹੈ|
ਪੱਥਰ- ਸ਼ਾਇਦ ਪੱਥਰ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਝੱਲੇ ਪੱਥਰ|

तू और मैं

तेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव
अमावस की रात से भी अंधेरी है
लेकिन मेरे दुःखों का अंधेरा
उससे ज़्यादा घना है।
तेरे जिस्म से
फूलों से भी अच्छी सुगंध आती है
लेकिन मुझे रोटी की सुगंघ
उससे भी अच्छी लगती है।
तेरी भावनाओं में
मुझे पता है
बहुत गर्मी है
लेकिन
सर्दी से बजती हुई हड्डियों को
चुप कराने के लिए
वो काफ़ी नहीं है।

रवि कांत 'अनमोल'

क्या लिखूँ?

भाषा भावनाओं को प्रकट करती है
यह पढ़ा था
लेकिन जब भावनाएं
शब्दों में ढलने से इनकार कर दें
और जब शब्द
भवनाओं के हमजोली न हों।
तो तुम ही कहो
मैं क्या कहूँ, क्या लिखूँ?

तुम्हें मैं रोज़ ही एक चिट्ठी लिखता हूँ,
सोच के कागज़ पर
क्लपना की कलम से।
शब्द उसके कुछ धुँधले होते हैं
पर भाव सटीक साफ़।
और रोज़ ही
मुझे तुम्हारा उत्तर मिलता है।
रोज़ ही मैं तुमसे मिलता हूँ
अपनी कहता हूँ
तुम्हारी सुनता हूँ।
लेकिन शब्दों का सहारा लिए बिना।
क्योंकि मेरे लिए
भाव एक चीज़ हैं और शब्द बिल्कुल दूसरी
भाव सूक्ष्म हैं और शब्द स्थूल
भाव निर्मल हैं और शब्द मलिन
भाव ब्रह्म हैं और शब्द संसार
इसलिए भाव कभी शब्दों में नहीं बंधते।
इसीलिए शब्द भावों के हमजोली नहीं होते।
भाव लिखे नहीं जाते और न कहे जाते हैं।
फिर भी
तुम्हारे आग्रह पर ऐ दोस्त
मैं कागज़ कलम लिए बैठा हूँ
अब तुम ही बताओ
मैं क्या कहूँ?
क्या लिखूँ?

 
रवि कांत 'अनमोल'

विरासत

विरासत
(कारगिल हमले के समय
पाकिस्तान के नाम लिखा गया पत्र)
मैने तो दोस्ती का हाथ
तुम्हारी तरफ़ बढाया था।
क्योंकि हम दोनो
केवल पड़ोसी नहीं
भाई नहीं
बल्कि एक ही शरीर के
दो टुकड़े हैं।
चलो, फिर से एक होना
हमारी तक़दीर में न भी सही
पर एक साथ रहना तो
हमारी मजबूरी है।
फिर प्यार मुहब्बत से
क्यों न रहें?
बस यही सोच कर
मैंने दोस्ती का तुम्हारी ओर
बढ़ाया था।
पर तुमने
मेरे हाथ को पकड़ कर
धोखे का खंजर घोंप दिया
मेरी ही बगल में।
पता नहीं
यह तुम्हारी फितरत है,
तुम्हारा पागलपन है,
या किसी और की शह।
लेकिन जो भी हो,
तुम्हारे इस वार का करारा जवाब देना
अब मेरा फ़र्ज़ बन गया है।
ताकि अगली बार
ऐसी हिमाकत करने से पहले
तुम्हें सात बार सोचना पड़े।
ताकि सारी दुनिया जान ले
कि प्यार और दोस्ती
मेरी संस्कृति है, कमज़ोरी नहीं।
शांति यदि मेरी चाहत है
तो वीरता मेरी विरासत है।
सिर्फ़ दरवेश का स्वभाव ही नहीं
मेरे पास सिपाही का हौसला भी है।
प्यार से सभी को
सीने से लगाने वाले बाजुओं में
शत्रु को मसल डालने की ताकत भी है।
यह बात मैं एक बार फिर
सारी दुनिया के सामने साबित कर दूँगा।
और सच मानो
इसके बाद फिर तुम्हारी ओर दोस्ती का हाथ
मैं ज़रूर बढ़ाऊँगा
प्यार का पैग़ाम
फिर आएगा मेरी ओर से
क्योंकि मुझे विरासत में
सिपाही का हौसला ही नहीं
सभी का भला मांगने वाला
दरवेश का दिल भी मिला है।

रवि कांत 'अनमोल'

जीवन ढंग

कमियों की बेमौसम बरसात से लड़ते लड़ते
जीवन हारवैस्टर के नीवे से निकल चुके
खेत जैसा हो चुका है।
सिरविहीन अधूरी इच्छाएं, बेमतलब खड़ी हैं।
विचारों का हल च्लाने से पहले
इन्हें जलाना पड़ेगा
और फिर शायद नई दिशाओं का बीज डाल कर
दोबारा, लक्ष्यों की फ़सल उगाई जाएगी।

रवि कांत 'अनमोल'

दैत्य

प्रतीक्षा के दैत्य ने
मेरे जीवन के एक और दिन को
अपने ज़ालिम जबड़ों से
चबा चबा कर खाया
और मैं बेबस सा
इस क्रूरता को देखता रहा-झेलता रहा।
तेरा पैग़ाम फ़रिश्ता बन कर
पता नहीं कब आएगा
और पता नहीं कब
इस दैत्य का अंत होगा।

रवि कांत 'अनमोल'

प्रश्न

मैं क्या हूँ? क्यों हूँ?
यही प्रश्न अभी तक अनुत्तरित पड़े हैं।
तो क्यों,
तुम्हारे अस्तित्तव का प्रश्न उठाया जाए?
जब मैं स्वयं ही एक प्रश्न हूँ
तो किसी और प्रश्न का उत्तर
क्यों ढूंढता फिरूँ?
अभी तो मुझे
स्वयं का पता लगाना है।
अपनी ही गुत्थियों को
सुलझाना है।
उसके बाद सोचा जाएगा
कि
तुम क्या हो?
हो भी या नहीं?
हो,
तो क्यों हो?
नहीं हो,
तो क्यों नहीं हो?
किन्तु यह सब प्रश्न
अभी क्यों उठाए जाएं?
अभी तो मैं स्वयं ही
एक प्रश्न हूँ।
तुम सा ही कठिन
या तुम से भी कठिन।
और मुझे तलाश है
अपने उत्तर की, तुम्हारे नहीं।

रवि कांत 'अनमोल'

तांडव

भूख
जब नंगी होकर नाचती है
ज़मीर जल कर राख हो जाता है
और नैतिकता पैरों पर गिर पड़ती है
त्राहि त्राहि कर उठती है
शायद इसी नृत्य को
तांडव कहते हैं

रवि कांत 'अनमोल'

डैम

अरमानों की एक नदी
मेरे अंदर भी उफ़नती है
लेकिन मजबूरियों का डैम
उसे खुल कर बहने नहीं देता
बाँध लेता है उसे
समझौतों की
असंख्य नहरों में बहाने के लिए

रवि कांत अनमोल

मैं मालिक हूँ


मैं मालिक हूँ
यह मुल्क मेरा है।
ये घर, ये गलियां,
ये खेत, ये क्यारियां,
ये बाग़, बग़ीचे, फुलवारियां,
ये जंगल, पहाड़ मैदान,
ये झरने, नहरें, दरिया,
ये पोखर, कुएं, तालाब,
ये समंदर, सब मेरे हैं ।
ये पुल, सड़कें, डैम
ये इमारतें, दफ़तर मिलें
ये कोठीयां, कारें, बंगले,
ये गाड़ीयां, मोटरें,
ये जहाज़, किश्तियां, बेड़े, सब मेरे हैं ।
मैं ही सब का मालिक हूँ
क्या हुआ जो ये मेरी पहुँच में नहीं हैं ।
क्या हुआ जो मैं इन्हें छू नहीं सकता ।
पर मालिक तो मैं ही हूँ।
ये अलग बात है कि
मेरे पास साइकल भी नहीं,
मैं मोटे टाट से तन ढाँपता हूँ
और रहता हूँ सड़क किनारे, खुले आकाश तले ।
लेकिन ये बढ़िया विदेशी कारें मेरी हैं,
ये शानदार कपड़े की मिलें मेरी हैं,
और ये सजे हुए बंगले भी मेरे ही हैं।
ये अलग बात है कि मैं खाना रोज़ नहीं खाता,
दवाई कभी नहीं
और मरता हूँ सड़क पर, बेइलाज ।
लेकिन ये बड़े-बड़े अनाज गोदाम मेरे हैं,
ये आधुनिक अस्पाताल मेरे हैं।
ये दवाओं के कारखाने भी मेरे ही हैं।
इन सब का मालिक मैं ही हूँ।
मैं
हां मैं ही बादशाह हूँ इस मुल्क का,
सब जानते हैं, मानते हैं, स्वीकारते हैं।
यहाँ तक कि मुल्क के कर्ता-धर्ता भी,
समय-समय पर मुझे सलाम मारते हैं।
हर काम करने से पहले मेरा नाम लेते हैं।
चाहे कोठियां अपने सगों को देनी हों,
चाहे पैट्रोल पंप यारों में बांटने हों,
और चाहे राशन डीपुओं की नीलामी करनी हो,
सब मेरे नाम पर करते हैं
मेरी मुहर तले।
आख़िर मैं मालिक हूँ,
और यह मुल्क मेरा है।
मंत्री से संतरी तक,
ऊपर से नीचे तक,
सब मेरे ख़िदमतगार हैं,
सेवादार ।
वैसे ये सब के सब हुक्म चलाते हैं,
आज्ञा देते हैं, फ़ैसला लेते हैं।
और इनके हुक्म मुझे झेलने पड़ते हैं
इनकी इच्छाएं मुझे नंगे बदन,
बर्दाश्त करनी पड़ती हैं।
इनके विदेशी खाते
मेरे नाम पर कर्ज़ लेकर भरे जाते हैं,
इनकी पार्टियों के लिए अनाज,
मेरी थाली में से निकाला जाता है,
और इनकी महँगी कारों के लिए पैट्रोल
मेरे शरीर में से निचोड़ा जाता है ।
लेकिन फिर भी
मैं मालिक हूँ और ये सब मेरे नौकर।
बड़ी हैरत की बात है, पर हैरान न होइए,
यही तो तलिस्म है।
मेरी अंगुली पर लगने वाली,
दो बूँद स्याही,
मुझे मेरे हक़ से वंचित कर देती है।
दो बूँद स्याही
मालिक को नौकर
और नौकर को मालिक बना देती है
पाँच साल के लिए।
पूरे पाँच साल के लिए
मेरी ताकत मेरे हक़, सब कुछ छीन कर,
उनको दे देती है।
और मैं चिराग़ के जिन्न की तरह
उनका ग़ुलाम हो जाता हूं,
पाँच साल के लिए।
और पाँच साल बाद,
जब अवधि समाप्त होती है,
तब वो फिर सामने खड़े होते हैं
हाथ जोड़े, जादुई स्याही लेकर,
और मैं आज्ञाकारी गुलाम की तरह
फिर अंगुली आगे करता हूँ ।


रवि कांत अनमोल

Thursday, January 21, 2010

मेरी आज़ाद नज़्में

आज़ाद नज़्म, छन्दबद्ध अथवा पाबन्द नज़्म से इन अर्थों में अलग है कि इसमें हमारे भाव बहुत तेज़ी से उफ़न कर बाहर आते हैं और हमें इतना समय ही नहीं देते कि हम छन्द के बारे में कुछ सोच पाएं,बह्र को समझ पाएं। इस तरह आज़ाद नज़्म बहुधा अधिक प्राकृतिक और अधिक भावपूर्ण रहती है, लेकिन इससे बह्र और छन्द का महत्व समाप्त नहीं होता। बह्र और छन्द का अभ्यास होने से हमारे विचार लयबद्ध रूप में ही निकलते हैं और यदि कभी भावों का प्रवाह स्वछ्न्द रूप से भी होता है तब भी लयात्मक्ता अपने आप उनमें आ जाती है और आज़ाद नज़्म में भी एक तरह की लय आ जाती है। लय ही तो है जो कविता को कविता बनाती है। बहुत अधिक अभ्यासी हो जाने पर कवि छन्दसिद्ध हो जाता है और फिर वह जो भी कहता है स्वभाविक रूप से छन्दबद्ध होकर ही उसकी ज़ुबान से निकलता है, कवि के लिए यह आदर्श स्थिति है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, नज़ीर अकबराबादी और मिर्ज़ा ग़ालिब इत्यादि कई कवियों के साथ ऐसा ही था। वे किसी भी विषय पर किसी भी समय आशुकविता करने की योग्यता रखते थे। भाव उनकी ज़ुबान पर आते ही छन्दबद्ध हो जाते थे। ऐसी स्थिति प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नहीं है- आज के व्यस्तता भरे समय में तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसे में मेरे जैसे कम अभ्यास वाले लोगों के मन में जो तीव्र भाव आते हैं, यदि उन्हें छन्द में ढालने के लिए थोड़ा रुकना पड़े तो उनकी तीव्रता में कमी आने की संभावना रहती है। जब ऐसी स्थिति हो तो मुक्त छन्द कविता लिखना या आज़ाद नज़्म कहना भी वाजिब ही है। वैसे छन्द का अभ्यास भी करते रहना चाहिए जिससे विचार छन्द में न सही, कम से कम लय में तो निकलें ही।

मेरी आज़ाद नज़्म भी एक अभ्यासार्थी के तीव्र भावावेगों का प्रवाह ही है- कुछ स्वछ्न्द, कुछ लयात्मक।

रवि कांत अनमोल