Monday, August 11, 2014

ग़ज़ल - हम इस जहाने फ़ानी में दो पल ठहर चले

हम इस जहाने फ़ानी में दो पल ठहर चले
जाने कहां से आए थे जाने किधर चले

मां की दुआएं इस तरह चलती हैं हमकदम
जैसे कि मेरे हमकदम कोई शजर चले

मैं एक रोशनी की किरन हूँ, न जाने क्यों
हर वक्त मेरे साथ ये मिट्टी का घर चले

जीना भी इस जहां में कहां है हुनर से कम
देखें कि अब कहां तलक अपना हुनर चले

अल्फ़ाज़ अपने तौलते हैं मोतियों से हम
जिस जिस को छू लिया उसे नायाब कर चले

’अनमोल' सच कहें हमे इस राहे इश्क पर
चलना सहल हरगिज़ भी नहीं था मगर चले

रवि कांत अनमोल

Wednesday, August 6, 2014

आवाज़ जब भी दो

आवाज़ जब भी दो
रुक कर देख भी लिया करो
जवाब के लिए
एक पल को
शायद
कोई इंतज़ार ही कर रहा हो
जवाब देने के लिए
तुम्हारी आवाज़ का