Sunday, August 30, 2015

अब तो आती नहीं इधर खुश्बू

उड़ गई ले हवा के पर खुश्बू
क्या पता जाए किस नगर खुश्बू

फूल की पंखुड़ी पे सोई थी
तितलियों से गई है डर खुश्बू

फूल झूमे बहार की धुन पर
पल में हर सू गई बिखर खुश्बू

असमानों से आग बरसी है
है पसीने से तर-ब-तर खुश्बू

अब तो बनती है कारखानों में
थी बहारों की हमसफ़र खुश्बू

बाग में जब भी आम पकते थे
आया करती थी मेरे घर खुश्बू

आप इक बार मुस्कुरा दीजे
जाएगी हर तरफ़ बिखर खुश्बू

तुम जहां भी जिधर भी जाते हो
फैलती है उधर उधर खुश्बू

बन गए अब मकान खेतों में
अब तो आती नहीं इधर खुश्बू

रवि कांत अनमोल

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